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पर्वत पुरुष की तपस्या का प्रतिफल है यह

25, Feb 2014

गया : बात बहुत पुरानी नहीं है। 60 के दशक में एक युवक ने 'तपस्या' शुरू की और तप ने उसे 80 के दशक में 'पर्वत पुरुष' के रूप में स्थापित कर दिया। आज उसे लोग बाबा दशरथ मांझी के नाम से जानते हैं। गया जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर गहलौर घाटी राजगीर की पंच पहाड़ियों में से एक है। इस घाटी के पत्थरों को काट-काटकर 22 फुट चौड़ा, 25 फुट ऊंचा और 360 फीट लंबा रास्ता बनाकर बाबा दशरथ ने इसे प्रेम स्मारक के रूप में स्थापित कर दिया है। कई लेखकों ने तो गहलौर घाटी के इस नायाब कार्य की तुलना 'ताजमहल' से भी की है। वहां एक शहंशाह का प्रेम और यहां एक फकीर का जुनून दिखता है।

प्रेम में 22 वर्ष पत्थर से टकराए : बाबा अब नहीं रहे। लेकिन उनके सपनों को साकार किया जा रहा है। छेनी-हथौड़ी के बल पर उनके द्वारा बनाई गई राह पर अब गाड़ियां दौड़ने लगी हैं। जिले के मोहड़ा प्रखंड की दूरी वजीरगंज प्रखंड से 40 किमी कम हो गई है। इस सड़क से गुजरने वाले बाबा का नाम जरूर लेते हैं। उन्हें बाबा के साथ उनकी पत्‍‌नी फगुनियां भी याद आती है। जिसके प्रेम में बाबा 22 वर्षो तक पत्थर से टकराते रहे। फगुनियां इस रास्ते को नहीं देख पाईं। वह परलोक चली गईं। बाबा तो गहलौर के ही होकर रह गए। उनके पार्थिव शरीर को उसी स्थान पर समाधि दी गई। मानो वह अपने इस प्रेम स्मारक पर बराबर नजर रख रहे हों।

पत्नी के आंसू ने दी पत्थर को गलाने की प्रेरणा : गरीब परिवार में जन्मे बाबा दशरथ के जीविकोपार्जन का जरिया मजदूरी कर पेट पालना था। खेत में काम के अलावे जंगल में लकड़ियां काटते थे। एक दिन गेहलौर पहाड़ी के दूसरी तरफ लकड़ी काट रहे थे। तपिश भरी गर्मी के दिन में उनके लिए खाना और पानी लेकर प्रतिदिन की भाति पत्‍‌नी फगुनिया गेहलौर के दर्रे को पार कर रही थी। पथरीला और सकरा दर्रे में वह पत्थर से टकराकर गिर गई। उसे चोट भी आई और मटकी फूटकर पानी बह गया। किसी तरह दर्रा पार कर वह दूसरी ओर जब दशरथ के पास पहुंची तो वह फफक कर रो पड़ी। दशरथ अचरज में पड़ गया और रोने का कारण जाना। उस वक्त वह गेहलौर के पहाड़ी को निहारता रहा। मन में कुछ ठान लिया। पत्‍‌नी को कुछ नहीं कहा। दूसरे दिन वह मजदूरी पर न जाकर छेनी, हथौड़ी और कुदाल लेकर उस दर्रे को चौड़ा करने में जुट गया। दशरथ पर मानो जुनून सवार हो गया था। पत्‍‌नी उसके इस कार्य से पहले तो विचलित हुई। गुजरते वक्त के साथ वह साथ रही। भले ही ईश्वर को मंजूर नहीं था। कुछ साल बाद वह चल बसी। दर्रा को चौड़ा रास्ता बनते नहीं देख सकी। लेकिन आज भी फगुनिया की याद में बाबा दशरथ का प्रेम स्मारक एक मिसाल है।

प्रभावित हुए थे नीतीश :

बाबा के कार्य से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतने प्रभावित हुए कि एक बार पटना के जनता दरबार में जब बाबा उनसे मिलने गए तो नीतीश ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ही बैठा दिया। मुख्यमंत्री की पहल पर गहलौर घाटी पर पक्की सड़क का निर्माण पूरा हो गया। यह बाबा का सपना था। इसके अतिरिक्त सामुदायिक भवन बन गया और अस्पताल व स्कूल आदि विकास के कई कार्य यहां प्रगति पर है। गहलौर घाटी तक जाने के लिए सड़कें चौड़ी हो गईं।

परिवार आज भी गर्दिश में : बाबा का परिवार आज भी गर्दिश में है। उनके इकलौते पुत्र भागीरथ मांझी और पुत्रवधू बसंती देवी इंदिरा आवास में रह रहे हैं। बाबा के नाम पर बसे कई घरों का एक टोला 'दशरथ नगर' के प्राथमिक विद्यालय में दोनों पति-पत्‍‌नी मध्याह्न भोजन बनाकर बच्चों को खिलाते और उसी से स्वयं का जीवन यापन कर रहे हैं। उन्हें मजदूरी के रूप में प्रतिमाह एक-एक हजार रुपया दिया जाता है। इनकी एक पुत्री है। जिसका विवाह हो गया। बाबा के पुत्र-पुत्रवधू भी वृद्ध हो चले हैं। इनके पास सरकार द्वारा प्रदत्त दो एकड़ भूमि है। जिस पर दलहन की खेती होती है। बातचीत में भागीरथ मांझी खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। वे कहते हैं कि मेरे पिता ने ऐसा काम कर दिया। जिसे देखने दूर-दूर से बड़े-बड़े लोग आते हैं। बाबा के इस कार्य को देखकर रश्मिरथी की वह पंक्ति स्वत: याद आ जाती है- 'मानव जब जोर लगता है, पत्थर पानी बन जाता है।'

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Dr.O.P.Tiwari
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