रात्रि में काम करना मृत्यु को बुलाना

Published On: February 27, 2018 at 7:45 AM 0 Comments R Baranwal

इससे डायबिटीज़ टाईप २, हृदय रोग और कैंसर रोग होने का गंभीर ख़तरा

आयुर्वेद पहले से ही कहते रहे हैं कि अच्छी सेहत के लिए भरपूर नींद जरुरी है। नींद के विषय भारतीय चिकित्सा शास्त्रों का स्पष्ट मत रहा है कि रात्रि सोने के लिए है और दिन कार्य करने के लिए। लेकिन पश्चिम की अपसंस्कृति ने रात्रि में कार्य करने पर बल देता रहा। खासकर मस्तिष्क से जुड़े कार्यों में विशेष कर रात्रि का ही चयन किया जाता रहा है।

पिछले कुछ सालों में कई देशों में हुए अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि रात में काम करना आपकी सेहत के लिए बहुत ख़तरनाक़ है। यूरोप में किए गए इस अध्ययन की एक अंग रही सायरा मांटेग्यू बता रही हैं कि रात में काम करने का शरीर पर क्या असर होता है। ‘‘मैं उन ३५ लाख ब्रितानी नागरिकों में से एक हूँ जो नाइट शिफ़्ट में काम करते हैं। इनमें से कुछ और ज्यादा घंटे और कुछ तो पूरी रात काम करते हैं। ५० साल पहले आम तौर पर लोग आठ घंटे की नींद लेते थे। लेकिन अब यह घटकर औसतन ६.५ घंटे हो गई है। बहुत सारे लोग नींद को आलस मानते हैं। लेकिन यह उतना ही ज़रूरी है जितना सांस लेना और खाना। ये वो समय है जब हमारा दिमाग दिन भर के कामों और यादों को व्यवस्थित करता है और इस दौरान शरीर कुछ अंदरूनी मरम्मत का काम भी करता है।’’

अध्ययन में पाया गया कि भरपूर नींद लेने के बाद भी रात में काम करने का समय ग़लत है। हमेशा से यह माना जाता था कि शरीर की जैविक घड़ी रात में काम के हिसाब से खुद को अभ्यस्त कर लेती है। लेकिन ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े स्लीप एक्सपर्ट प्रोफ़ेसर रसेल फ़ोस्टर कहते हैं, ‘कई सारे अध्ययन बताते हैं कि ऐसा नहीं है।’ जो लोग रात में लंबे समय तक काम करते हैं, उनको टाइप २ डायबिटीज़, हृदय रोग और कैंसर का गंभीर ख़तरा होता है।

असल में हमारे मस्तिष्क में कुछ हज़ार ऐसी कोशिकाएं होती हैं, जहां हमारे शरीर की मुख्य जैविक घड़ी होती हैंं। कब सोना है, कब जगना है या भोजन पचाने के लिए लीवर को कब एंजाइम पैदा करना है, जैविक घड़ी इन सबको नियंत्रित करती है। यह घड़ी हमारे दिल की धड़कन को भी नियंत्रित करती है, यह सुबह धड़कन को तेज़ और शाम को सुस्त करती है। जैविक घड़ी पर २० सालों तक काम कर चुके कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर माइकल हैस्टिंग्स कहते हैं, ‘हमारे सभी अंग खास समय पर खास काम करने के लिए पहले से तय अनुवांशिक निर्देशों के अधीन होते हैं।’

इसी अध्ययन से निकलकर आया है कि आधी रात को काम करते हुए चॉकलेट खाने से शुगर और फ़ैट दिन के मुकाबले कहीं देर तक ख़ून में दौड़ता रहता है। खून में शुगर की अधिक मात्रा से टाइप २ डायबिटीज़ होता है और फैट का स्तर बढ़ने से दिल का रोग होता है। इसीलिए रात की पाली में काम करने वालों में दिल के रोग का ख़तरा डेढ़ गुना ज़्यादा होता है। रात में काम करने वालों में मोटापे का भी यही कारण है। कैंसर से भी इसका संबंध है। रोगों की सूची लंबी है। एक शोध में पता चला है कि दस साल तक रात की पाली में काम करने वाले मज़दूर का दिमाग ६.५ साल बूढ़ा हो जाता है। उन्हें सोचने और याद रखने में दिक्कत आती है।

ऐसा ही एक अध्ययन अमरीका में ७५,००० नर्सों पर की गई वहां भी ऐसा ही परिणाम मिला है। ब्रिटेन में रात में काम करने वालों के लिए कोई विशेष स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के नियम नहीं हैं। लेकिन कुछ कंपनियों और सरकारों ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेना शुरू किया है। वहीं डेनमार्क की सरकार ने उन महिलाओं को मुआवजा दिया है जिन्हें रात में काम करने के कारण ब्रेस्ट कैंसर हो गया था। प्रदूषण की वजह से होने वाली बीमारियों के कारण रात में काम करने वाले इलेक्ट्रानिक्स वर्करों को कोरिया ने मुआवजा दिया है।

चूहों पर किए गए परीक्षणों से ‘स्पष्ट तौर पर’ पता चला है कि नींद के अनियमित पैटर्न से कैंसर की आशंका बढ़ जाती है, एक अध्ययन से ऐसे संकेत मिले हैं। ‘करंट बायोलॉजी’ में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट से इस विचार को बल मिला है कि शिफ्ट में काम करने वालों की सेहत पर अनियमित नींद का ख़राब असर पड़ता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जिन महिलाओं के परिवार में स्तन कैंसर होेने का ख़तरा है उन्हें शिफ्ट में कभी काम नहीं करना चाहिए। आंकड़ों से ये भी पता चला कि जिन चूहों का नींद का पैटर्न अनियमित था वे सामान्य खाना खाने के बावजूद २० फीसदी ज्यादा भारी थे। अध्ययनों से अक्सर ये संकेत मिले हैं कि शिफ्ट में काम करने वालों और फ्लाइट अटेंडेंट्स में स्तन कैंसर का ज्यादा ख़तरा होता है। इस बारे में एक तर्क यह है कि शरीर की अंदरूनी लय या बॉडी क्लॉक को अस्त-व्यस्त करने से इस बीमारी का ख़तरा बढ़ जाता है। जिन चूहों में स्तन कैंसर होेने का ख़तरा था, उनकी बॉडी क्लॉक एक साल तक हर हफ्ते बारह घंटे पीछे हुई थी। सामान्य तौर पर पचास हफ्तों में उन्हें ट्यूमर होते थे लेकिन उनकी नींद में जब लगातार बाधा डाली गई तो ट्यूमर आठ हफ्ते पहले ही उभर आए।

एक शोध के अनुसार अगर आप पर्याप्त नहीं सोते हैं तो आपकी जिंदगी के साल काफ़ी कम हो सकते हैं। अत: छक कर सोएं और स्वस्थ, सक्रिय, लंबी जिंदगी जीएं।.

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